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Saturday, 23 December 2023

गीता जयंती

 || आज गीता जयंती है ||

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मार्गशीर्ष माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी पर गीताजयंती मनाई जाती है। इस साल 23 दिसंबर को गीता जयंती है। गीता हिंदू धर्म का एक पवित्र धार्मिक ग्रंथ है। गीता में भगवान श्री कृष्ण के उपदेशों का वर्णन है। भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन के माध्यम से संसार को गीता का पाठ तब पढ़ाया था, जब अर्जुन के कदम कुरुक्षेत्र युद्ध की युद्ध भूमि में डगमगाने लगे थे। श्री कृष्ण के उपदेशों को सुनकर अर्जुन अपने लक्ष्य को पूरा करने की ओर अग्रसर हुए। कहा जाता है कि गीता में जीवन की हर एक परेशानी का हल मिल जाता है। गीता में कही गई श्री कृष्ण की बातें आज भी जीवन में आगे बढ़ते रहने की प्रेरणा देती हैं। ऐसे में यदि आप भी सफल होना चाहते हैं तो गीता जयंती के अवसर पर गीता के कुछ उपदेश जरूर पढ़ें।


क्रोध पर नियंत्रण 

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भगवान श्रीकृष्ण गीता का उपदेश देते हुए अर्जुन से कहते हैं कि क्रोध से सभी तरह के कार्य बिगड़ने लगते हैं। क्रोध करने से इंसान का पतन आरंभ हो जाता है। साथ ही व्यक्ति अच्छे और बुरे परिणाम में फर्क करना भूल जाता है और वह पतन के राह पर चल देता है। इसलिए क्रोध करने से बचना चाहिए। 


व्यर्थ की चिंता से बचें-

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श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि कभी भी व्यक्ति को व्यर्थ की चिंता नहीं करनी चाहिए। हर किसी को एक न एक दिन मरना है, आत्मा न तो पैदा होती है और न ही ये मरती है। आत्मा अमर है, इसलिए व्यर्थ की चिंता को छोड़कर कर्म के रास्ते पर आगे बढ़ना चाहिए।


मन पर रखें काबू-

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प्रत्येक व्यक्ति को अपने मन पर नियंत्रण रखना चाहिए। गीता के उपदेश में श्री कृष्ण ने बताया है कि जो व्यक्ति अपने मन पर काबू करना सीख लेता है, वह हर तरह की बाधा को आसानी से पार कर सकता है। इसलिए व्यक्ति को हमेशा अपने मन पर नियंत्रण रखना चाहिए।


फल की इच्छा छोड़ कर्म पर ध्यान देना 

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श्रीकृष्ण कहते हैं कि मनुष्य को फल की इच्छा छोड़कर कर्म पर ध्यान देना चाहिए। मनुष्य जैसा कर्म करता है, उसे फल भी उसी के अनुरूप मिलता है, इसलिए अच्छे कर्म करते रहें। 


शास्त्रों के अनुसार द्वापर युग में इसी दिन भगवान श्री कृष्ण ने कुरुक्षेत्र में अर्जुन को गीता का ज्ञान दिया था इसीलिए इस दिन को गीता जयंती के रूप में मनाया जाने लगा। हिंदू धर्म में इस दिन का खास महत्व है। गीता के श्लोकों में नकारात्मकता को सकारात्मकता में परिवर्तित करने की अद्भुत शक्ति है। यह श्लोक जितने आज से 5160 पूर्व सार्थक थे, उतने आज भी हैं। यह श्लोक व्यक्ति को सपनों और निराशा की दुनिया से निकालकर जीवन की वास्तविकता से परिचित करवाते हैं।


मानस मे गीता 

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श्री रामचरितमानस मे 6 गीताए पायी जाती है ।

        उनके संक्षिप्त विवरण है -

1-अयोध्याकांड मे जिस प्रसंग मे निशाद राज को लक्षमण जी ने भगवान् श्री राम को ब्रह्म होने के प्रसंग मे समझाया है,वह लक्ष्मण गीता के नाम से जानी जाती है 


2-अरण्यण कांड मे जहाँ श्री शेष अवतारी लखन लालजी को श्री राम ने उपदेश दिया है , वो श्री राम गीता कहलाती है | 


3- लंका कांड मे जहॉ प्रभु श्री राम द्वारा युद्ध स्थल मे विभिषण जी के मोह को दूर किया गया है वो श्रीमद्भागवद्गीता है | 


4- उत्तर कांड मे जहाँ पूरवासियो को बूलाकर

       परमार्थ उपदेश दिया है ,वह पुरजन गीता है | 


5-6 उत्तर कांड मे ही पॉचवी और छठी गीता है जो "ज्ञान- भक्ति-निरुपण,ज्ञान-दीपक और भक्ति की महान्‌ महिमा" प्रसंग मे है और ज्ञान गीता और भक्ति गीता के नाम से जानी जाती है ।


     || गीता जयंती की हार्दिक शुभकामनाएं ||

                 ✍☘💕

Monday, 27 November 2023

कार्तिक पूर्णिमा ब प्रकाश पर्व

 राम राम जी*


*कार्तिक पूर्णिमा ब प्रकाश पर्व गुरु पर्व*


*देवों की दीपावली है कार्तिक पूर्णिमा,*


देव दीपावली व प्रकाश पर्व


पौराणिक कथा के अनुसार, देवता अपनी दीपावली कार्तिक पूर्णिमा की रात को ही मनाते हैं कार्तिक पूर्णिमा में स्नान और दान को अधिक महत्व दिया जाता है। इस दिन किसी भी पवित्र नदी में स्नान करने से मनुष्य के सभी पाप धुल जाते हैं। कार्तिक पूर्णिमा पर दीप दान को भी विशेष महत्व दिया जाता है। माना जाता है कि इस दिन दीप दान करने से सभी देवताओं का आशीर्वाद मिलता हैं...




इस वर्ष, कार्तिक पूर्णिमा 27 नवंबर 2023 को मनाई जाएगी। पूर्णिमा तिथि 26 नवंबर को दोपहर 3:54 बजे से शुरू होकर 27 नवंबर को दोपहर 2:46 बजे समाप्त हो रही है।


कार्तिक पूर्णिमा का महत्व:


पौराणिक कथा के अनुसार, भगवान शिव ने त्रिपुरारी का अवतार लिया था और इस दिन को त्रिपुरासुर के नाम से जाना जाने वाले असुर भाइयों की एक तिकड़ी को मार दिया था। यही कारण है कि इस पूर्णिमा का एक नाम त्रिपुरी पूर्णिमा भी है। इस प्रकार अत्याचार को समाप्त कर भगवान शिव ने शांति बहाल की थी। इसलिए, देवताओं ने राक्षसों पर भगवान शिव की विजय के लिए श्रद्धांजलि अर्पित करने के लिए इस दिन दीपावली मनाई थी। कार्तिक पूर्णिमा के दिन भगवान शिव की विजय के उपलक्ष्य में, काशी (वाराणसी) के पवित्र शहर में भक्त गंगा के घाटों पर तेल ओर घी के दीपक जलाकर और अपने घरों को सजाकर देव दीपावली मनाते हैं।


* श्री गुरू नानक देव जी के जन्मदिन को देशभर में प्रकाश पर्व के तौर पर भी मनाया जाता है। इस दिन दिए जलाकर रोशनी की जाती है। गुरुद्वारा साहिब में दीप प्रज्वलित किए जाते हैं।*




*जिनि सेविआ तिनि पाइआ मानु।*


  *नानक गावीऐ गुणी निधानु।*




जिसने प्रभु की सेवा की उसे  सर्वोत्तम 


 प्रतिष्ठा मिली।इसीलिये उसके गुणों का गायन करना चाहिये-ऐसा गुरू नानक जी का मत है।




*गावीऐ सुणीऐ मनि रखीऐ भाउ*


 *दुखु परहरि सुखु घरि लै जाइ।*




उसके गुणों का गीत गाने सुनने एवं मन


 में भाव रखने से समस्त दुखों का नाश एवं अनन्य सुखों का भण्डार प्राप्त होता है।


*आप सभी जन को Astropawankv की पूरी Team की तरफ़ से   देव दीपावली व प्रकाश पर्व की हार्दिक बधाई ||*


*राम राम जी*


*Verma's Scientific Astrology & Vastu Research Center Ludhiana Punjab Bharat Phone..9417311379  www.astropawankv.com*

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Monday, 13 November 2023

विश्वकर्मा जयंती

 

विश्वकर्मा दिवस ब भाई दूज दिवस

 आप सभी जन को  Team Astropawankv की तरफ़ से विश्वकर्मा दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं........







Sunday, 12 November 2023

दीपावली.. दीपोत्सव पर्व





 *दीपोत्सव पर्व दीपावली*

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हिंदू धर्म के प्राचीन त्योहारों में से एक है।हर साल कार्तिक मास की अमावस्या को दिवाली का त्योहार मनाया जाता है। दिवाली को लेकर कई धार्मिक और पौराणिक मान्यताएं जुड़ी है। माना जाता है कि यह पर्व भगवान श्रीराम के लंकापति रावण पर विजय हासिल करने और 14 साल का वनवास पूरा कर घर लौटने की खुशी में मनाया जाता है। माना जाता है कि जब भगवान राम देवी सीता और लक्ष्मण के साथ अयोध्या लौटे थे तो लोगों ने दीप जलाकर उनका स्वागत किया था। इसीलिए हर साल इस दिन घरों में दीये जलाए जाते हैं।


दीपावली का महत्व

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दीपावली सबसे बड़ा उत्सव आश्विन या कार्तिक के कृष्ण पक्ष के अंतिम दिन होता है। दीपावली को रोशनी का त्योहार के रूप में भी जाना जाता है। इस दिन मां लक्ष्मी और भगवान गणेश की भी पूजा की जाती है और शाम को दीपों की रोशनी से पूरा भारत जगमगाता है।दिवाली क्या है और इसे प्रकाश पर्व क्यों कहते हैं? दिवाली (दीपावली) प्रकाश पर्व या प्रकाश का त्योहार है। हमारे देखने के साधन यानि हमारी आँखों की बनावट के कारण ही इंसान के जीवन में प्रकाश का इतना महत्व है। बाकी प्राणियों के लिये प्रकाश का मतलब उनका टिके रहना ही है, पर मनुष्य के लिये प्रकाश सिर्फ देखने या न देखने की बात नहीं है। प्रकाश का आना हमारे जीवन में एक नयी शुरुआत का सूचक होता है ,और, उससे भी ज्यादा ये हमें स्पष्टता देता है। ज्यादातर प्राणी अपनी प्रकृति, अपने स्वभाव के हिसाब से जीते हैं जिसकी वजह से, क्या करना है और क्या नहीं करना, इसके बारे में उन्हें ज्यादा उलझन नहीं होती।


      || दीपोत्सव पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं ||



                  *ज्योति एवं प्रकाश का पर्व*

           

अग्नि के आविष्कार के पश्चात् संपूर्ण मानव जाति ने अंधकार से प्रकाश तक पहुंचने के 👉वाहक के रूप में दीपक को स्वीकार किया है। यही कारण है कि हम हिंदुओं का कोई भी धार्मिक - अनुष्ठान दीपक जलाए बिना पूरा नहीं होता है।


दीपावली आलोक का पर्व है ,जो वैदिक ऋषियों

      की इस कामना की प्रत्यक्ष अभिव्यक्ति है -


 (जीवा ज्योति ऋषिर्मय (ऋग्वेद)

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अर्थात् हम प्रतिदिन जीवन जीते हुए ज्योति की उपलब्धि कर उससे उल्लसित होते रहें मानव की अपूर्णता से पूर्णता की ओर उर्ध्वमुखी यात्रा ही तमसो मा ज्योतिर्गमय की मंत्र - प्रार्थना सृजित करती है।


अथर्ववेद में उल्लेख है -

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आरोह तमसो ज्योति अर्थात् अंधकार से

   निकलकर प्रकाश (ज्ञान) की ओर बढ़े।


महर्षि वेदव्यास जी ने पांडवों की वन-यात्रा के समय युधिष्ठिर को आत्मिक दीपक को प्रज्वलित करने का दिव्य - संदेश दिया था।


सत्याधारस्तपस्तैलं दयावर्ति: क्षमा शिखा।

  अंधकार  प्रवेष्ट्यो  दीपो  यत्नेन  वार्यताम्।।


अर्थात् - युधिष्ठिर ! जब भी तुम्हारे जीवन में दु:खों , कष्टों का अंधकार आए , तो तुम यत्न से दीपक जलाना 👉ऐसा दीपक , जिसका आधार सत्य हो , जिसमें तेल तप यानी साधना का हो , जिसकी बाती दया की हो और शिखा से विकसित लौ क्षमा की हो।


भगवान श्री कृष्ण गीता में कहते हैं -

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तेषामेवानुकम्पार्थमहमज्ञानजं तम:।

 नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता।।


अर्थ - उनके (भक्तों के) ऊपर अनुग्रह करने के लिए उनके अंतःकरण में स्थित हुआ मैं स्वयं ही उनके अज्ञान जनित अंधकार को प्रकाश मय तत्वज्ञान रूप दीपक के द्वारा नष्ट कर देता हूं।


रामचरितमानस में -

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राम नाम  मनिदीप धरु  जीह  देहरीं  द्वार।

 तुलसी भीतर बाहेरहुं जौं चाहसि उजिआर ।।


11 या 21 दीपों को प्रज्वलित कर दीपावली

   की स्तुति निम्नलिखित मंत्र से की जाती है -


त्वं ज्योतिस्तवं रविश्चन्द्रो विद्युदग्निश्च तारका:।

   सर्वेषां ज्योतिषां  ज्योतिर्दीपावल्यै नमो नमः।।


दीपावली पर्व पर अभिलाषा -

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मिटे अंधेरा अंतर्मन का,

   साथी ऐसी ज्योति जलाओ।


जल जाए सब कलुष धरा का,

   दीपराग ऐसा कुछ गाओ।।


प्रेम,दया और मानवता का,

    सारे जग को पाठ पढ़ाओ।


आलोकित हो जाए जनमन,

   ऐसा जगमग दीप जलाओ।।


ज्योति पर्व दीपावली की हार्दिक बधाई 

      और शुभकामनाएं 

                 

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Saturday, 11 November 2023

छोटी दिवाली

 *छोटी दीपावली*


*आज नरक चतुर्दशी एवं रूप चतुर्दशी है*

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दीपावली को एक दिन का पर्व कहना न्योचित नहीं होगा। दीपावली पर्व के ठीक एक दिन पहले मनाई जाने वाली नरक चतुर्दशी को छोटी दीवाली,रूप चौदस और काली चतुर्दशी भी कहा जाता है। मान्यता है कि कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी के विधि-विधान से पूजा करने वाले व्यक्ति को सभी पापों से मुक्ति मिल जाती है।


इसी दिन शाम को दीपदान की प्रथा है जिसे यमराज के लिए किया जाता है। इस पर्व का जो महत्व है उस दृष्टि से भी यह काफी महत्वपूर्ण त्योहार है। यह पांच पर्वों की श्रृंखला के मध्य में रहने वाला त्योहार है।


दीपावली से दो दिन पहले धनतेरस फिर नरक चतुर्दशी या छोटी दीपावली। इसे छोटी दीपावली इसलिए कहा जाता है क्योंकि दीपावली से एक दिन पहले रात के समय उसी प्रकार दीए की रोशनी से रात के तिमिर को प्रकाश पुंज से दूर भगा दिया जाता है जैसे दीपावली की रात को।


क्या है इसकी कथा-

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इस रात दीए जलाने की प्रथा के संदर्भ में कई पौराणिक कथाएं और लोकमान्यताएं हैं। एक कथा के अनुसार आज के दिन ही भगवान श्री कृष्ण ने अत्याचारी और दुराचारी दु्र्दांत असुर नरकासुर का वध किया था और सोलह हजार एक सौ कन्याओं को नरकासुर के बंदी गृह से मुक्त कर उन्हें सम्मान प्रदान किया था। इस उपलक्ष में दीयों की बारात सजाई जाती है।


इस दिन के व्रत और पूजा के संदर्भ में एक दूसरी कथा यह है कि रंति देव नामक एक पुण्यात्मा और धर्मात्मा राजा थे। उन्होंने अनजाने में भी कोई पाप नहीं किया था लेकिन जब मृत्यु का समय आया तो उनके समक्ष यमदूत आ खड़े हुए।यमदूत को सामने देख राजा अचंभित हुए और बोले मैंने तो कभी कोई पाप कर्म नहीं किया फिर आप लोग मुझे लेने क्यों आए हो क्योंकि आपके यहां आने का मतलब है कि मुझे नर्क जाना होगा। आप मुझ पर कृपा करें और बताएं कि मेरे किस अपराध के कारण मुझे नरक जाना पड़ रहा है।


यह सुनकर यमदूत ने कहा कि हे राजन् एक बार आपके द्वार से एक बार एक ब्राह्मण भूखा लौट गया था,यह उसी पापकर्म का फल है। इसके बाद राजा ने यमदूत से एक वर्ष समय मांगा। तब यमदूतों ने राजा को एक वर्ष की मोहलत दे दी। राजा अपनी परेशानी लेकर ऋषियों के पास पहुंचे और उन्हें अपनी सारी कहानी सुनाकर उनसे इस पाप से मुक्ति का क्या उपाय पूछा।


तब ऋषि ने उन्हें बताया कि कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी का व्रत करें और ब्राह्मणों को भोजन करवा कर उनके प्रति हुए अपने अपराधों के लिए क्षमा याचना करें। राजा ने वैसा ही किया जैसा ऋषियों ने उन्हें बताया। इस प्रकार राजा पाप मुक्त हुए और उन्हें विष्णु लोक में स्थान प्राप्त हुआ। उस दिन से पाप और नर्क से मुक्ति हेतु भूलोक में कार्तिक चतुर्दशी के दिन का व्रत प्रचलित है।


क्या है इसका महत्व-

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इस दिन के महत्व के बारे में कहा जाता है कि इस दिन सूर्योदय से पूर्व उठकर तेल लगाकर और पानी में चिरचिरी ( अपामार्ग) के पत्ते डालकर उससे स्नान करने करके विष्णु मंदिर और कृष्ण मंदिर में भगवान का दर्शन करना करना चाहिए। इससे पाप कटता है और रूप सौन्दर्य की प्राप्ति होती है।


कई घरों में इस दिन रात को घर का सबसे बुजुर्ग सदस्य एक दिया जला कर पूरे घर में घुमाता है और फिर उसे ले कर घर से बाहर कहीं दूर रख कर आता है। घर के अन्य सदस्य अंदर रहते हैं और इस दिए को नहीं देखते। यह दीया यम का दीया कहलाता है। माना जाता है कि पूरे घर में इसे घुमा कर बाहर ले जाने से सभी बुराइयां और कथित बुरी शक्तियां घर से बाहर चली जाती हैं ।


  || रुप चतुर्दशी की हार्दिक शुभकामनाएं ||

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Friday, 10 November 2023

धन त्रयोदशी पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं

 आप सभी जन को Astropawankv की पूरी Team की तरफ़ से धन त्रयोदशी पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं




Thursday, 9 November 2023

धन त्रयोदशी पूजा अर्चना मुहुर्त

 *धनतेरस और शुभ मुहूर्त*

 


*आइए जानें धनतेरस पर क्यों खरीदा जाता है सोना और जानें शुभ मुहूर्त*


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कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी को धनतेरस के रूप में मनाया जाता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार समुद्र मंथन के समय कृष्ण त्रयोदशी के दिन अपने हाथों में कलश लेकर भगवान धनवंतरी प्रकट हुए थे  धनतेरस के खास मौके पर भगवान धन्वंतरि के साथ, भगवान कुबेर और माता लक्ष्मी जी की भी पूजा होती है। आपको मैं बता दूँ कि यह पर्व दिवाली से दो दिन पहले मनाया जाता है। इस दिन लोग बर्तन, सोने-चांदी, पीतल की वस्तुओं की खरीदारी करते हैं। भगवान धनवंतरी को आरोग्य के देवता माना जाता है.!


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*इन चीजों की खरीदारी को माना जाता है शुभ:-* ऐसा माना जाता है कि धनतेरस पर जो भी वस्तु लोग खरीदते हैं, उसका महत्व 13 गुना तक बढ़ जाता है। माना जाता है कि धनतेरस के दिन सोना, चांदी, पीतल खरीदने से घर में लक्ष्मी प्रवेश करती हैं। साथ ही, इस दिन लोग चांदी या अन्य धातुओं के बर्तन, प्लेट, झाड़ू या अन्य सामग्री की खरीदारी भी करते हैं।


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*धनतेरस पर झाडू खरीदना भी शुभ:-* अगर इस दिन आप अपनी व्यस्ताओं के चलते सोना-चांदी , पीतल, तांबा न खरीद पाएं हों तो चिंता न करें। इस दिन कम से कम झाडू अवश्य खरीद लें। मुख्य द्वार और पूरे घर की साफ-सफाई के लिए झाडू बहुत जरूरी है। माना जाता है कि इस दिन नया झाडू खरीदने से श्रीहरि विष्णु, देवी लक्ष्मी, भगवान धनवंतरी, कुबेर की सदा कृपा होती है।


*धनतेरस पूजन*


*धन त्रयोदशी*

*त्रयोदशी तिथि  10 नवम्बर 2023 दोपहर  12 :36 से  लेकर 11 नवम्बर  2023 दोपहर 13:58 तक है*

 


धनतेरस को झाड़ू क्यों खरीदते हैं ....



*धनतेरस की पूजा कैसे करें ....*


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👉 *जानिए धनतेरस की पूजा विधि, व्रत कथा और शुभ मुहूर्त :-*




👉 दिवाली से पहले धनतेरस पूजा का विशेष महत्व माना गया है। इस दिन धन और आरोग्य के देवता *भगवान धन्वंतरि* की पूजा के साथ मां लक्ष्मी की पूजा भी की जाती है। 




👉 ऐसी मान्यता है कि *भगवान धन्वंतरि* का जन्म समुद्र मंथन के दौरान हुआ था। फिर इनके दो दिन बाद मां लक्ष्मी प्रकट हुईं। 




👉 धनतेरस के दिन सोने-चांदी, पीतल के बर्तनों की खरीददारी की जाती है...कई जगह  *झाड़ू की भी खरीदारी* करने की परंपरा है। 



👉 मत्स्य पुराण के अनुसार झाड़ू को मां लक्ष्मी का रूप माना जाता है। घर में झाड़ू के पैर लग जाए तो इसे भी अशुभ माानते हैं। 




👉 इसलिए घर में झाड़ू से घर साफ करने के बाद ऐसी जगह रखा जाता है जहां पैर नहीं लगे। क्योंकि झाड़ू का मां लक्ष्मी का प्रतीक माना जाता है।




👉 मान्यताओं के मुताबिक झाड़ू को सुख-शांति बढ़ाने और दुष्ट शक्तियों का सर्वनाश करने वाला भी बताया गया है। 




👉 ऐसी मान्यता है कि झाड़ू घर से दरिद्रता हटाती है और इससे दरिद्रता का नाश होता है।




👉 धनतेरस पर घर में नई झाड़ू से झाड़ लगाने से कर्ज से भी मुक्ति मिलती है, ऐसा भी माना जाता है। इसलिए इस दिन झाड़ू खरीदने की पुरानी परंपरा  है। 




👉 शास्त्रों के अनुसार धनतेरस के दिन झाड़ू खरीदने से लक्ष्मी माता रुठकर घर से बाहर नहीं जाती हैं और वह घर में स्थिर रहती है। 




👉 ऐसी मान्यता है कि धनतेरस पर विधि विधान पूजा करने से मां लक्ष्मी की कृपा हमेशा बनी रहती है। 




👉 *जानिए धनतेरस की पूजा विधि, व्रत कथा और शुभ मुहूर्त :-*




*धनतेरस पूजन की सामग्री :-* 




👉 21 पूरे कमल बीज, , 5 सुपारी, लक्ष्मी–गणेश के सिक्के ये 12 ग्राम या अधिक भी हो सकते हैं, पत्र, अगरबत्ती, चूड़ी, तुलसी, पान, सिक्के, काजल, चंदन, लौंग, नारियल, दहीशरीफा, धूप, फूल, चावल, रोली, गंगा जल, माला, हल्दी, शहद, कपूर रोली, मौली आदि।




 *धनतेरस पूजा विधि :-* 



👉 धनतेरस के दिन शाम के समय उत्तर दिशा में कुबेर, धन्वंतरि भगवान और मां लक्ष्मी की पूजा की जाती है। पूजा के समय घी का दीपक जलाएं। कुबेर को सफेद मिठाई और भगवान धन्वंतरि को पीली मिठाई चढ़ाएं। 






👉पूजा करते समय “ॐ ह्रीं कुबेराय नमः” मंत्र का जाप करें। फिर “धन्वन्तरि स्तोत्र” का पाठ करें। धन्वान्तारी पूजा के बाद भगवान गणेश और माता लक्ष्मी की भी पूजा करें। भगवान गणेश और माता लक्ष्मी के लिए मिट्टी का दीपक जलाएं। उन्हें फूल चढ़ाएं और मिठाई का भोग लगाएं।




👉 धनतेरस पर *यम के नाम दीप* जलाने की विधि : दीपक जलाने से पहले पूजा करें। किसी लकड़ी के बेंच या जमीन पर तख्त रखकर रोली से स्वास्तिक का निशान बनायें। 




👉 फिर मिट्टी या आटे के चौमुखी दीपक को उस पर रख दें। दीप पर तिलक लगाएं। चावल और फूल चढ़ाएं। चीनी डालें। इसके बाद 1 रुपये का सिक्का डालें और परिवार के सदस्यों को तिलक लगाएं।




👉 दीप को प्रणाम कर उसे घर के मुख्य द्वार पर रख दें। ये ध्यान दें कि *दीपक की लौ दक्षिण दिशा* की तरफ हो। 




👉 क्योंकि ये यमराज की दिशा मानी जाती है। ऐसा करने से अकाल मृत्यु टल जाती है।




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👉 *पूजा का शुभ मुहूर्त :-*


धनतेरस पर धनवंतरि और कुबेर की पूजा का भी विधान है !!




👉  धन त्रयोदशी 10 नवंबर  शुक्रवार को पूर्णतया प्रदोष व्यापनी है



👉 *धनतेरस पर पूजन के लिए शुभ मुहूर्त शाम 6.18 मिनट से रात 8.14 मिनट तक रहेगा*




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Friday, 27 October 2023

शरद् पूर्णिमा की खीर और चंद्र ग्रहण

 *शरद् पूर्णिमा की खीर  और चंद्र ग्रहण*


*ग्रहण का सूतक काल , खीर बनाने का समय ...व  शरद् पूर्णिमा की खीर का महत्व ......*


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*कब है शरद् पूर्णिमा 2023…* 


शरद् पूर्णिमा तिथि का प्रारंभ: 28 अक्टूबर, शनिवार, प्रात: 04:17 बजे से…

शरद् पूर्णिमा तिथि का समापन: 29 अक्टूबर, रविवार, 01:53  पर…

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 *कब है चंद्र ग्रहण 2023…!?* 


साल का अंतिम चंद्र ग्रहण प्रारंभ समय: 28 अक्टूबर, देर रात 01:06 बजे‌… 

चंद्र ग्रहण समापन समय: 28 अक्टूबर, मध्य रात्रि 02:22 बजे

सूतक काल का समय: 28 अक्टूबर, दोपहर 02:52 बजे से लेकर मध्य रात्रि 02:22 बजे तक…


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*चंद्र ग्रहण के समय न रखें शरद पूर्णिमा की खीर, इस गलती से बचें…* 


28 अक्टूबर को शरद् पूर्णिमा है और उस दिन चंद्र ग्रहण का सूतक काल दोपहर से प्रारंभ है. यदि आप इस दिन खीर बनाकर रखते हैं तो वह दूषित हो जाएगा. सूतक काल के पूर्व आप खीर बना लेते हैं तो भी वह ग्रहण से दूषित होगा. उसे आप ग्रहण के बाद चंद्रमा की रोशनी में रखकर नहीं खा सकते हैं. दूषित खीर आपके स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकता है.


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 *शरद् पूर्णिमा 2023 खीर रखने का सही समय…* 


आप शरद पूर्णिमा की खीर चतुर्दशी की रात यानि 27 अक्टूबर शुक्रवार की रात बना लें. फिर 28 अक्टूबर को जब शरद पूर्णिमा की तिथि प्रात: 04:17 बजे से शुरू हो तो उस समय उस खीर को चंद्रमा की रोशनी में रख दें. उस दिन चंद्रास्त लगभग प्रात: 04:42 पर होगा. .चंद्रास्त के बाद उस खीर को खा सकते हैं. 28 अक्टूबर के प्रात: पूर्णिमा तिथि में चंद्रमा की औषधियुक्त रोशनी प्राप्त हो जाएगी.


दूसरा विकल्प यह है कि आप 28 अक्टूबर के मध्य रात्रि चंद्र ग्रहण के बाद खीर बनाएं और उसे खुले आसमान के नीचे रख दें ताकि उसमें चंद्रमा की रोशनी पड़े. बाद में उस खीर को खा सकते हैं.


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*शरद पूर्णिमा की खीर का महत्व…* 


धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, शरद पूर्णिमा की रात चंद्रमा 16 कलाओं से पूर्ण होकर आलोकित होता है. इस वजह से उसकी किरणों में अमृत के समान औषधीय गुण होते हैं. जब हम शरद पूर्णिमा की रात खीर को खुले आसमान के नीचे रखते हैं तो उसमें चंद्रमा की किरणें पड़ती हैं, जिससे वह खीर औषधीय गुणों वाला हो जाता है. खीर की सामग्री में दूध, चावल  चंद्रमा से जुड़ी हुई वस्तुएं हैं, इसके सेवन से मौसम में हुई तब्दीली से शरीर में होने वाले शीतकालीन प्रभाव मलेरिया बुखार, इत्यादि से स्वास्थ्य लाभ तो होता ही है, साथ ही कुंडली का चंद्र दोष निवारण भी होता है. 

अधिक जानकारी के लिए ब अपनी जन्मकुंडली बनवाने ब दिखाने के लिए ओर अपने उपाय परहेज़ जानने के लिए मिलें...


*राम राम जी*


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Thursday, 26 October 2023

चंद्र ग्रहण....उपाय परहेज़

 *⚫ चंद्र - ग्रहण ⚫* 

*28 अक्टूबर 2023 शनिवार*


*चंद्र ग्रहण काल में उपाय परहेज़*


चंद्रग्रहण सिर्फ और सिर्फ वैज्ञानिक दृष्टि से ही नहीं बल्कि धार्मिक दृष्टि से भी बेहद महत्वपूर्ण घटना है। साल का अंतिम चंद्रग्रहण शरद पूर्णिमा के दिन लगने जा रहा है। शरद पूर्णिमा के दिन चंद्रमा अपनी 16 कलाओं से परिपूर्ण रहता है ऐसे में इस दिन ग्रहण लगना बेहद महत्वपूर्ण रहने वाला है। इस साल का अंतिम चंद्रग्रहण मेष राशि में लगने जा रहा है। ग्रहण का असर सभी राशियों पर दिखाई देने वाला है।


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*▪️चंद्र-ग्रहण सूतक काल का समय-:* 

चंद्रग्रहण 28 अक्टूबर 2023, शनिवार देर रात 1 बजकर 5 मिनट से लेकर 2 बजकर 24 मिनट तक रहेगा। यानी यह ग्रहण 1 घंटा 18 मिनट का रहेगा। इस चंद्र ग्रहण का सूतक काल भारत में मान्य होगा।


*▪️चंद्र ग्रहण का समय-:* 

चंद्रग्रहण का सूतक काल ग्रहण के 9 घंटे पूर्व से शुरु हो जाता है अतः भारतीय समय अनुसार, चंद्रग्रहण का सूतक शाम में 4 बजकर 5 मिनट पर आरंभ हो जाएगा। इस ग्रहण में चंद्रबिम्ब दक्षिण की तरफ से ग्रस्त होगा।


*▪️देश और दुनिया में कहां- कहां दिखाई देगा ग्रहण-:* 

चंद्रग्रहण भारत, ऑस्ट्रेलिया, संपूर्ण एशिया, यूरोप, अफ्रीका, दक्षिणी-पूर्वी अमेरिका, उत्तरी अमेरिका, कैनेडा, ब्राजील , एटलांटिक महासागर में यह ग्रहण दिखाई देगा। भारत में यह ग्रहण शुरुआत से अंत तक दिखाई देगा।


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*▪️सूतक काल में न करें ये काम-:* 


चंद्रग्रहण का सूतक शाम में 4 बजकर 5 मिनट पर प्रारंभ हो जाएगा। इस दौरान आपको किसी प्रकार का मांगलिक कार्य,  हवन और भगवान की मूर्ति का स्पर्श नहीं करना चाहिए। इस समय आप सभी अपने अपने गुरु मंत्र, भगवान जी का नाम जप, श्रीहनुमान चालीसा कर सकते हैं।


 चंद्र ग्रहण- सूतक काल के दौरान भोजन बनाना व भोजन करना भी उचित नहीं है। हालांकि, सूतक काल में गर्भवती स्त्री, बच्चे, वृद्ध जन  बीमार जन को आवश्यक हो तो वो भोजन कर सकते हैं। ऐसा करने से उन्हें दोष नहीं लगेगा। ध्यान रखें की सूतक काल आरंभ होने से पहले खाने पीने की चीजों में तुलसी के दो - दो पत्ते डाल दें। इसके अलावा आप इसमें कुशा भी डाल सकते हैं।

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*▪️चंद्र ग्रहण पुण्य काल में उपाय परहेज़-:*

 चंद्र, ग्रहण से मुक्त होने के बाद स्नान- दान- पुण्य- पूजा उपासना इत्यादि का विशेष महत्व है। अतः 29 अक्टूबर, सुबह स्नान के बाद भगवान की पूजा उपासना, दान पुण्य करें। ऐसा करने से चंद्र ग्रहण के अशुभ प्रभाव कम होते हैं। और अपनी अपनी जन्मकुंडली के ग्रह, राशि, नक्षत्रों के अनुसार जो भी उपाय परहेज़ हों उन्हें अवश्य करें और चन्द्र ग्रह के दोष निवारण के उपाय परहेज़ जन्मकुंडली ब वर्ष कुंडली के अनुसार जो भी हो उन्हें ग्रहण काल के बाद अवश्य करें।


           *Research Astrologers Pawan Kumar Verma (B.A.,D.P.I.,LL.B.)& Monita Verma Astro Vastu.....Verma's Scientific Astrology and Vastu Research Center Ludhiana Punjab Bharat Phone number..9417311379. www.astropawankv.com*

Tuesday, 24 October 2023

विजया दशमी... दशहरा





_अधर्म पर धर्म की विजय, असत्य पर सत्य की विजय, बुराई पर अच्छाई की विजय,पाप पर पुण्य की विजय, अत्याचार पर सदाचार की विजय,क्रोध पर दया - क्षमा की विजय,अज्ञान पर ज्ञान की विजय, रावण पर श्रीराम की विजय के प्रतीक पावन पर्व_   _दशहरा -_ _विजयादशमी की आपको और आपके परिवार को हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं...._

                           🙏

 विजया दशमी 

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दशहरा यानी विजयादशमी का त्योहार आज 24 अक्टूबर को मनाया जाएगा।दशहरे के दिन ही भगवान राम ने रावण पर विजय प्राप्त की थी।इसी दिन देवी मां की प्रतिमा विसर्जन भी होता है। इस दिन अस्त्र शस्त्रों की पूजा की जाती है और विजय पर्व मनाया जाता है।


कैसे मनाएं दशहरा? 

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इस दिन सबसे पहले देवी और फिर भगवान राम की पूजा करें। पूजा के बाद देवी और प्रभु राम के मंत्रों का जाप करें। अगर कलश की स्थापना की है तो नारियल हटा लें। उसे प्रसाद के रूप में ग्रहण करें।कलश का जल पूरे घर में छिड़कें। ताकि घर की नकारात्मकता समाप्त हो जाए। जिस जगह आपने नवरात्रि मे पूजा की है, उस स्थान पर रात भर दीपक जलाएं। अगर आप शस्त्र पूजा करना चाहते हैं तो उस पर तिलक लगाकर रक्षा सूत्र बांधें।


तिथि और मुहूर्त हिंदू पंचांग के अनुसार, आश्विन शुक्ल दशमी तिथि 23 अक्टूबर शाम 5 बजकर 44 मिनट से 24 अक्टूबर दोपहर 3 बजकर 14 मिनट तक रहेगी। उदया तिथि के चलते 24 अक्टूबर को विजयदशमी मनाई जाएगी। इस दिन सुबह 11 बजकर 42 मिनट से दोपहर 12 बजकर 27 मिनट तक अभिजीत मुहूर्त रहेगा।  फिर दोपहर 1 बजकर 58 मिनट से दोपहर 2 बजकर 43 मिनट तक विजय मुहूर्त रहेगा। पूजा के लिए ये दोनों ही मुहूर्त शुभ हैं।


   || विजयादशमी की हार्दिक शुभकामनाएं ||

                 

Thursday, 5 October 2023

पितरों को भोजन कैसे मिलता है...

 || पितरों को भोजन कैसे मिलता है ?||

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प्राय: कुछ लोग यह शंका करते हैं कि श्राद्ध में समर्पित

     की गईं वस्तुएं पितरों को कैसे मिलती है? 


कर्मों की भिन्नता के कारण मरने के बाद गतियां भी भिन्न- भिन्न होती हैं। कोई देवता, कोई पितर, कोई प्रेत, कोई हाथी, कोई चींटी, कोई वृक्ष और कोई तृण बन जाता है। तब मन में यह शंका होती है कि छोटे से पिंड से या ब्राह्मण को भोजन करने से अलग-अलग योनियों में पितरों को तृप्ति कैसे मिलती है?


इस शंका का स्कंद पुराण में बहुत

         सुन्दर समाधान मिलता है

 

एक बार राजा करंधम ने महायोगी महाकाल से पूछा, मनुष्यों द्वारा पितरों के लिए जो तर्पण या पिंडदान किया जाता है तो वह जल, पिंड आदि तो यहीं रह जाता है फिर पितरों के पास वे वस्तुएं कैसे पहुंचती हैं और कैसे पितरों को तृप्ति होती है?'

 

भगवान महाकाल ने बताया कि विश्व नियंता ने ऐसी व्यवस्था कर रखी है कि श्राद्ध की सामग्री उनके अनुरूप होकर पितरों के पास पहुंचती है। इस व्यवस्था के अधिपति हैं अग्निष्वात आदि। पितरों और देवताओं की योनि ऐसी है कि वे दूर से कही हुई बातें सुन लेते हैं, दूर की पूजा ग्रहण कर लेते हैं और दूर से कही गईं स्तुतियों से ही प्रसन्न हो जाते हैं।


वे भूत, भविष्य व वर्तमान सब जानते हैं और सभी जगह पहुंच सकते हैं। 5 तन्मात्राएं, मन, बुद्धि, अहंकार और प्रकृति-इन 9 तत्वों से उनका शरीर बना होता है और इसके भीतर 10वें तत्व के रूप में साक्षात भगवान पुरुषोत्तम उसमें निवास करते हैं इसलिए देवता और पितर गंध व रसतत्व से तृप्त होते हैं। शब्द तत्व से तृप्त रहते हैं और स्पर्श तत्व को ग्रहण करते हैं। पवित्रता से ही वे प्रसन्न होते हैं और वे वर देते हैं।

 

पितरों का आहार है अन्न-जल का सारतत्व- जैसे मनुष्यों का आहार अन्न है, पशुओं का आहार तृण है, वैसे ही पितरों का आहार अन्न का सारतत्व (गंध और रस) है। अत: वे अन्न व जल का सारतत्व ही ग्रहण करते हैं। शेष जो स्थूल वस्तु है, वह यहीं रह जाती है।

 

किस रूप में पहुंचता है पितरों को आहार?

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नाम व गोत्र के उच्चारण के साथ जो अन्न-जल आदि पितरों को दिया जाता है, विश्वदेव एवं अग्निष्वात (दिव्य पितर) हव्य-कव्य को पितरों तक पहुंचा देते हैं। 


यदि पितर देव योनि को प्राप्त हुए हैं तो यहां

    दिया गया अन्न उन्हें 'अमृत' होकर प्राप्त होता है। 


यदि गंधर्व बन गए हैं, तो वह अन्न 

    उन्हें भोगों के रूप में प्राप्त होता है। 


यदि पशु योनि में हैं, तो वह अन्न 

        तृण के रूप में प्राप्त होता है। 


नाग योनि में वायु रूप से, 


यक्ष योनि में पान रूप से, 


राक्षस योनि में आमिष रूप में, 


दानव योनि में मांस रूप में, 


प्रेत योनि में रुधिर रूप में 


और मनुष्य बन जाने पर भोगने योग्य

     तृप्तिकारक पदार्थों के रूप में प्राप्त होता है।

 

जिस प्रकार बछड़ा झुंड में अपनी मां को ढूंढ ही लेता है, उसी प्रकार नाम, गोत्र, हृदय की भक्ति एवं देश-काल आदि के सहारे दिए गए पदार्थों को मंत्र पितरों के पास पहुंचा देते हैं।जीव चाहें सैकड़ों योनियों को भी पार क्यों न कर गया हो, तृप्ति तो उसके पास पहुंच ही जाती है।

 

श्राद्ध में आमंत्रित ब्राह्मण पितरों के प्रतिनिधि रूप होते हैं। एक बार पुष्कर में श्रीरामजी अपने पिता दशरथजी का श्राद्ध कर रहे थे। रामजी जब ब्राह्मणों को भोजन कराने लगे तो सीताजी वृक्ष की ओट में खड़ी हो गईं ब्राह्मण भोजन के बाद रामजी ने जब सीताजी से इसका कारण पूछा तो वे बोलीं-

 

मैंने जो आश्चर्य देखा, उसे मैं आपको बताती हूं। आपने जब नाम-गोत्र का उच्चारण कर अपने पिता-दादा आदि का आवाहन किया तो वे यहां ब्राह्मणों के शरीर में छाया रूप में सटकर उपस्थित थे। ब्राह्मणों के शरीर में मुझे अपने श्वसुर आदि पितृगण दिखाई दिए फिर भला मैं मर्यादा का उल्लंघन कर वहां कैसे खड़ी रहती? इसलिए मैं ओट में हो गई।'

 

तुलसी से पिंडार्चन किए जाने पर पितरगण प्रलयपर्यंत तृप्त रहते हैं। तुलसी की गंध से प्रसन्न होकर गरुड़ पर आरूढ़ होकर विष्णुलोक चले जाते हैं।

 

पितर प्रसन्न तो सभी देवता प्रसन्न- श्राद्ध से बढ़कर और कोई कल्याणकारी कार्य नहीं है और वंशवृद्धि के लिए पितरों की आराधना ही एकमात्र उपाय है।

 

आयु: पुत्रान् यश: स्वर्ग कीर्तिं पुष्टिं बलं श्रियम्।

   पशुन् सौख्यं धनं धान्यं प्राप्नुयात् पितृपूजनात्।।*

             (यमस्मृति, श्राद्धप्रकाश)

 

यमराजजी का कहना है कि श्राद्ध करने 

       से मिलते हैं ये 6 पवित्र लाभ-

 

 श्राद्ध कर्म से मनुष्य की आयु बढ़ती है।


पितरगण मनुष्य को पुत्र प्रदान कर

        वंश का विस्तार करते हैं।


परिवार में धन-धान्य का अंबार लगा देते हैं।


श्राद्ध कर्म मनुष्य के शरीर में बल-पौरुष

   की वृद्धि करता है और यश व पुष्टि प्रदान करता है।


पितरगण स्वास्थ्य, बल, श्रेय, धन-धान्य

    आदि सभी सुख, स्वर्ग व मोक्ष प्रदान करते हैं।


श्रद्धापूर्वक श्राद्ध करने वाले के परिवार में कोई क्लेश

  नहीं रहता, वरन वह समस्त जगत को तृप्त कर देता है।


     || सर्व पितरों को नमन और प्रणाम ||

                  Verma's Scientific Astrology and Vastu Research Center Ludhiana Punjab Bharat Phone number 9417311379




Tuesday, 5 September 2023

शिक्षक दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं

शिक्षक दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं

Team Astropawankv

Astropawankv
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Tuesday, 29 August 2023

रक्षा बंधन 2023

 *राम राम जी*


*रक्षाबंधन 2023: राखी का पर्व 30 या 31 अगस्त को, जानें एकदम सही जानकारी मुहूर्त के साथ*



*रक्षाबंधन के दिन भद्रा कब से कब तक है: रक्षा बंधन यानी राखी के पर्व को लेकर लोगों में असमंजस की स्थिति है। कुछ विद्वानों के अनुसार 30 और कुछ के अनुसार 31 अगस्त को मनाया जाना चाहिए रक्षाबंधन का त्योहार। आओ जानते हैं कि आखिर क्यों है ये दुविधा।*

 

*क्यों है असमंजस की स्थिति?*


परंपरा से श्रावण पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है राखी का पर्व।


पूर्णिमा तिथि 30 अगस्त को सुबह 10:58 पर प्रारंभ होकर 31 अगस्त को सुबह 07:14 पर समाप्त होगी।


पूर्णिमा का संपूर्ण काल 30 अगस्त को दिन के बाद रात्रि में रहेगा (अंग्रेजी समयानुसार 31 अगस्त की रात्रि में)


30 अगस्त को व्रत की पूर्णिमा रहेगी और 31 अगस्त को स्नान दान की पूर्णिमा रहेगी।


30 अगस्त पूर्णिमा के दिन इस बार भद्रा काल रहेगा।


भद्राकाल सुबह 10:58 से रात्रि 09:01 तक रहेगा।


भद्रा का निवास जब धरती पर रहता है तो कोई शुभ कार्य नहीं किए जा सकते हैं।


इस बार भद्रा का निवास धरती पर ही है।


ऐसे में 30 अगस्त को सुबह 10:58 से रात्रि 09:01 तक राखी नहीं बांध सकते हैं।


कुछ विद्वानों के अनुसार रात्रि 09:01 से अगले दिन सुबह 07:14 के बीच राखी बांध सकते हैं।


कुछ विद्वानों का मानना है कि देर रात्रि में शुभ कार्य किया जाना उचित नहीं है इसलिए कई लोग अगले दिन ही रक्षा बंधन मनाएंगे।


देश में कई जगह उदया तिथि के अनुसार ही यानी 31 अगस्त को भी त्योहार मनाया जाएगा।


*30 अगस्त को राखी बांधने का शुभ मुहूर्त समय:-* रात्रि 9:01 से 11:13 तक। (शुभ के बाद अमृत का चौघड़िया रहेगा)

 

*31 अगस्त को राखी बांधने का शुभ मुहूर्त :-*


राखी बांधने का शुभ मुहूर्त इस दिन सुबह 7 बजकर 5 मिनट तक का है। इसके बाद पूर्णिमा का लोप हो जाएगा।


अमृत मुहूर्त सुबह 05:42 से 07:23 बजे तक।


इस दिन सुबह सुकर्मा योग रहेगा।

 

*इन मुहूर्त में भी बांधी जा सकती है राखी-*


अभिजीत मुहूर्त : दोपहर 12:14 से 01:04 तक।


अमृत काल : सुबह 11:27 से 12:51 तक।


विजय मुहूर्त : दोपहर 02:44 से 03:34 तक।


सायाह्न सन्ध्या : शाम 06:54 से रात्रि 08:03 तक।


         

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Wednesday, 16 August 2023

पितृ ऋण

 || *पुरुषोत्तम मास की अमावस्या विशेष पर* ||


*ऋण*

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 ऋण चार प्रकार होते हैं,

              पितृऋण सबसे 

                 भयानक असर देता है    

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मनुष्य जन्म लेता है तो कर्मानुसार उसकी मृत्यु तक कई तरह के ऋण, पाप और पुण्य उसका पीछा करते रहते हैं। हिन्दू शास्त्रों में कहा गया है कि तीन तरह के ऋण को चुकता कर देने से मनुष्य को बहुत से पाप और संकटों से छुटकारा मिल जाता है। हालांकि जो लोग इसमें विश्वास नहीं करते उनको भी जीवन के किसी मोड़ पर इसका भुगतान करना ही होगा। आखिर ये ऋण कौन से हैं और कैसे उतरेंगे यह जानना जरूरी है।


ये तीन ऋण हैं:-

 *1-देव ऋण,*

  *2- ऋषि ऋण* 

     *3-पितृ ऋण*

कहीं कहीं पर ब्रह्मा के ऋण का उल्लेख भी मिलता है। *इस तरह से चार ऋण हो जाते हैं।*

 

इन चार ऋणों को उतारना प्रत्येक व्यक्ति का कर्तव्य होना चाहिए। यह जीवन और अगला जीवन सुधारना हो, तो इन ऋणों के महत्व को समझना जरूरी है। मनुष्य पशुओं से इसलिए अलग है, क्योंकि उसके पास नैतिकता, धर्म और विज्ञान की समझ है। जो व्यक्ति इनको नहीं मानता वह पशुवत है।

 

क्यों चुकता करना होता है यह ऋण?

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तीन ऋण नहीं चुकता करने पर उत्पन्न होते हैं त्रिविध ताप अर्थात सांसारिक दुख, देवी दुख और कर्म के दुख।  *(दैहिक दुःख, दैविक दुःख, भौतिक दुःख)*  ऋणों को चुकता नहीं करने से उक्त प्रकार के दुख तो उत्पन्न होते ही हैं और इससे व्यक्ति के जीवन में पिता, पत्नी या पुत्र में से कोई एक सुख ही मिलता है या तीनों से वह वंचित रह जाता है। यदि व्यक्ति बहुत ज्यादा इन ऋणों से ग्रस्त है तो उसे पागलखाने,जेलखाने या दवाखाने में ही जीवन गुजारना होता है।

 

त्रिविध ताप क्या है?

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सांसारिक दुख अर्थात आपको कोई भी जीव,

   प्रकृति, मनुष्य या शारीरिक-मानसिक रोग कष्ट देगा।


देवी दुख अर्थात आपको ऊपरी शक्तियों द्वारा कष्ट मिलेगा। कर्म का दुख अर्थात आपके पिछले जन्म के कर्म और इस जन्म के बुरे कर्म मिलकर आपका दुर्भाग्य बढ़ाएंगे।इन सभी से मुक्ति के लिए ही ऋण का चुकता करना जरूरी है। ऋण का चुकता करने की शुरुआत ही संकटों से मुक्त होने की शुरुआत मानी गई है।


आज जाने पितृ ऋण को 

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पितृ ऋण :- यह ऋण हमारे पूर्वजों का माना गया है। पितृ ऋण कई तरह का होता है। हमारे कर्मों का,आत्मा का, पिता का,भाई का, बहन का,मां का,पत्नी का,बेटी और बेटे का। स्वऋण या आत्म ऋण का अर्थ है कि जब जातक,पूर्व जन्म में नास्तिक और धर्म विरोधी काम करता है, तो अगले जन्म में, उस पर स्वऋण चढ़ता है। मातृ ऋण से कर्ज चढ़ता जाता है और घर की शांति भंग हो जाती है।बहन के ऋण से व्यापार-नौकरी कभी भी स्थायी नहीं रहती। जीवन में संघर्ष इतना बढ़ जाता है कि जीने की इच्छा खत्म हो जाती है। भाई के ऋण से हर तरह की सफलता मिलने के बाद अचानक सब कुछ तबाह हो जाता है। 28 से 36 वर्ष की आयु के बीच तमाम तरह की तकलीफ झेलनी पड़ती है।


आप अपनी जन्मकुंडली को किसी अच्छे ज्योतिष विद्वान से अवलोकन करवाकर जन्मकुंडली में बनने वाले ऋण और ग्रह नक्षत्र दोष को जानकर उनके उपाय परहेज़ अवश्य करें। ताकि जीवन चक्र में सुख शांति और समृद्धि हमेशा बनी रहे।

             || पितृ देवाय नमः ||

                   ✍

*Research Astrologers Pawan Kumar Verma (B.A.,D.P.I.,LL.B.)& Monita Verma Astro Vastu Verma's Scientific Astrology and Vastu Research Center Ludhiana Punjab Bharat Phone number..9417311379 www.astropawankv.com*

Tuesday, 15 August 2023

Happy independence day

 From the whole Team of Astropawankv wish you all a very Happy Independence Day....


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Ludhiana, Punjab, Bharat.

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Friday, 4 August 2023

एक ज्ञान वर्धक कथा

 *राम राम जी*


*एक ज्ञान वर्धक कथा....... कष्ट परेशानियों का मूल्य....*


*किसी स्थान पर संतों की एक सभा चल रही थी, किसी ने एक घड़े में गंगाजल भरकर वहां रखवा दिया ताकि संतजन को जब प्यास लगे तो गंगाजल पी सकें*


*संतों की उस सभा के बाहर एक व्यक्ति खड़ा था, उसने गंगाजल से भरे घड़े को देखा तो उसे तरह-तरह के विचार आने लगे। वह सोचने लगा:- "अहा, यह घड़ा कितना भाग्यशाली है, एक तो इसमें किसी तालाब पोखर का नहीं बल्कि गंगाजल भरा गया और दूसरे यह अब सन्तों के काम आयेगा। संतों का स्पर्श मिलेगा, उनकी सेवा का अवसर मिलेगा, ऐसी किस्मत किसी-किसी की ही होती है।*


*घड़े ने उसके मन के भाव पढ़ लिए और घड़ा बोल पड़ा:- बंधु मैं तो मिट्टी के रूप में शून्य पड़ा था, किसी काम का नहीं था, कभी नहीं लगता था कि भगवान् ने हमारे साथ न्याय किया है। फिर एक दिन एक कुम्हार आया, उसने फावड़ा मार-मारकर हमको खोदा और गधे पर लादकर अपने घर ले गया।*


*वहां ले जाकर हमको उसने रौंदा, फिर पानी डालकर गूंथा, चाक पर चढ़ाकर तेजी से घुमाया, फिर गला काटा, फिर थापी मार-मारकर बराबर किया। बात यहीं नहीं रूकी, उसके बाद आंवे के अंदर आग में झोंक दिया जलने को। इतने कष्ट सहकर बाहर निकला तो गधे पर लादकर उसने मुझे बाजार में भेज दिया, वहां भी लोग ठोक-ठोककर देख रहे थे कि ठीक है कि नहीं?*

*ठोकने-पीटने के बाद मेरी कीमत लगायी भी तो क्या- बस 20 से 30 रुपये, मैं तो पल-पल यही सोचता रहा कि:- "हे ईश्वर सारे अन्याय मेरे ही साथ करना था, रोज एक नया कष्ट एक नई पीड़ा देते हो, मेरे साथ बस अन्याय ही अन्याय होना लिखा है।" भगवान ने कृपा करने की भी योजना बनाई है यह बात थोड़े ही मालूम पड़ती थी।*


*किसी सज्जन ने मुझे खरीद लिया और जब मुझमें गंगाजल भरकर सन्तों की सभा में भेज दिया तब मुझे आभास हुआ कि कुम्हार का वह फावड़ा चलाना भी भगवान् की कृपा थी। उसका वह गूंथना भी भगवान् की कृपा थी, आग में जलाना भी भगवान् की कृपा थी और बाजार में लोगों के द्वारा ठोके जाना भी भगवान् की कृपा ही थी।*


*अब मालूम पड़ा कि सब भगवान् की कृपा ही कृपा थी।*


*परिस्थितियां हमें तोड़ देती हैं, विचलित कर देती हैं- इतनी विचलित की भगवान के अस्तित्व पर भी प्रश्न उठाने लगते हैं। क्यों हम सबमें इतनी शक्ति नहीं होती ईश्वर की लीला समझने की, भविष्य में क्या होने वाला है उसे देखने की? इसी नादानी में हम ईश्वर द्वारा कृपा करने से पूर्व की जा रही तैयारी को समझ नहीं पाते। बस कोसना शुरू कर देते हैं कि सारे पूजा-पाठ, सारे जतन कर रहे हैं फिर भी ईश्वर हैं कि प्रसन्न होने और अपनी कृपा बरसाने का नाम ही नहीं ले रहे। पर हृदय से और शांत मन से सोचने का प्रयास कीजिए, क्या सचमुच ऐसा है या फिर हम ईश्वर के विधान को समझ ही नहीं पा रहे?*


*आप अपनी गाड़ी किसी ऐसे व्यक्ति को चलाने को नहीं देते जिसे अच्छे से ड्राइविंग न आती हो तो फिर ईश्वर अपनी कृपा उस व्यक्ति को कैसे सौंप सकते हैं जो अभी मन से पूरा पक्का न हुआ हो। कोई साधारण प्रसाद थोड़े ही है ये, मन से संतत्व का भाव लाना होगा।*


*ईश्वर द्वारा ली जा रही परीक्षा की घड़ी में भी हम सत्य और न्याय के पथ से विचलित नहीं होते तो ईश्वर की अनुकंपा होती जरूर है, किसी के साथ देर तो किसी के साथ सवेर। यह सब पूर्वजन्मों के कर्मों से भी तय होता है कि ईश्वर की कृपादृष्टि में समय कितना लगना है।*


*घड़े की तरह परीक्षा की अवधि में जो सत्यपथ पर टिका रहता है वह अपना जीवन सफल कर लेता है।*


*हर हर महादेव*

      *🙏🙏*





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Monday, 17 July 2023

हरियाली अमावस्या और श्रावण माह का दूसरा सोमवार...

 || *हरियाली अमावस्या और श्रावण माह का दूसरा सोमवार..* ||

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*श्रावण का अर्थ-*

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श्रावण शब्द श्रवण से बना है जिसका अर्थ है सुनना अर्थात सुनकर धर्म को समझना। वेदों को श्रुति कहा जाता है अर्थात उस ज्ञान को ईश्वर से सुनकर ऋषियों ने लोगों को सुनाया था।


अमावस्या पितरों की उपासना तिथि मानी जाती है। सोमवार के साथ अमावस्या का अद्भुत संयोग जीवन की हर मनोकामनाओं को पूरा कर सकता है। इस दिन उपवास रखकर शिवजी की पूजा और मंत्र जाप किए जाएं तो आर्थिक और पारिवारिक समस्याएं दूर हो जाती हैं।अगर कोई अज्ञात बाधा है तो इस दिन पूजा उपासना से विशेष लाभ लिया जा सकता है। अमावस्या के दिन शिवजी की पूजा प्रदोष काल में करना सर्वोत्तम होता है।


हरियाली अमावस्या का महत्व-

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 श्रावण मास की अमावस्या को हरियाली अमावस्या कहा जाता है। वातावरण की हरियाली के कारण इसको हरियाली अमावस्या कहा जाता है। इस दिन दान, ध्यान और स्नान का विशेष महत्व है। इसके अलावा इस दिन विभिन्न मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए पौधे भी लगाए जाते हैं। इस तिथि को पौधों के माध्यम से सम्पन्नता और समृद्धि प्राप्त की जा सकती है।


 || हरियाली अमावस्या की शुभकामनाएं ||


           *ॐ नमः शिवाय*


*विष को पचाने का सामर्थ्य केवल शिव भगवान महादेव जी में ही है*


                 *जरत सकल सुर वृंद, विषम गरल जेहि पान किय।*

   *तेहि न भजसि मन मंद, को कृपालु शंकर सरिस॥*

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*सर्व प्रथम सागर से निकला गरल (विष) प्राण संहारी,*

*पीकर जिसको नीलकंठ बन गये शंभू त्रिपुरारी।*


*विष को पचाने का सामर्थ्य शिव में ही है-*

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शिव के शरीर में सर्प लिपटे रहते हैं, ऐसा पुराणों में कहा गया है। सर्प साक्षात विष या मृत्यु का लक्षण है। किन्तु अमृतस्वरूप शिव पर उस विष या मृत्यु का कोई प्रभाव नहीं होता। मानसिक या मनन समाधि के देवता है।


सचमुच विष पीकर शंकरजी ने समस्त संसार पर बड़ी कृपा की, अन्यथा विष की लपटों से प्राणिमात्र भस्म हो जाते। विष को पचाने का सामर्थ्य भगवान  शिव में ही था।इसी पराक्रम के कारण वे देव-देव या महादेव कहलाए। विष साक्षात् मृत्यु का रूप है, जो प्राणों का लोप कर देता है। विषपान के कारण ही शिवजी की संज्ञा मृत्युंजय हुई। वैसे तो सभी देवता अमर माने जाते हैं, किन्तु विष के रूप में साक्षात् स्थूल मृत्यु से लोहा लेकर और उसे अपने शरीर में पचाकर वास्तविक मृत्युंजय की उपाधि शिव को ही प्राप्त हुई।


विषपान करने पर भी शिव के शरीर से स्वर्गिक प्राण शक्ति की सुगंधि ही निकलती रही । मृत्यु की दुर्गन्ध उनका स्पर्श न कर सकी। वे मृत्यु से मुक्त होकर अमृत के गर्भ में प्रतिष्ठित हो गए। #लिंग पुराण में समुद्र मंथन की कथा का उल्लेख करते हुए लिखा है कि विषपान करने के अनंतर शिवजी हिमालय की कंदरा में एकांत में जाकर बैठ गए। देवता उनकी स्तुति करना चाहते थे कि उन्होंने विषपान जैसा महान पराक्रम किया। उन्होंने देखा कि शिवजी हिमालय की गुफा में ध्यानरत हैं। देवता वहीं पहुंचें और उनकी प्रशंसा करने लगे कि महाराज आपने जैसा पराक्रम किया,वैसा आज तक किसी ने नहीं किया था।


भगवान शिवजी ने उत्तर दिया कि मैंने यह स्थूल विष पीकर कुछ भी विचित्र बात नहीं की। मेरी दृष्टि में वस्तुत: बड़ा वह है, जो इस संसार में भरे हुए विष को पचा सकता है। संसार को निचोड़ने से या अनुभव करने से जो विष सामने आता है, वह स्थूल की अपेक्षा कहीं अधिक भयंकर है। सब के लिए वह प्रकट होता है। उस पर विजय पाना ही सच्चा पुरुषार्थ है। 


      || *महामृत्युंजय की जय हो* ||

                ✍☘



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Saturday, 15 July 2023

आप न्यायधीश की नज़र में है

 || *आप न्यायाधीश की नजर मे है* ||

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आज बड़े बनने की होड़ चल रही है।सभी बुद्धिमान, ज्ञानी,कीर्तिमान,धनवान,सत्ता प्राप्त करने के लिए वाक युद्ध करते है।विभिन्न प्रकार के दांव- पेच जनता के सामने बताते है।लेकिन समय को नहीं देखते, काल की पहचान नहीं है क्या उन्हें ?


 क्या इससे पहले लोग इस धरती

            पर नहीं रहते  थे?


बलवान, ज्ञानवान, धनवान,कीर्तिवान,उच्च सत्ताधिकारी वह सब काल के गाल में समाहित हो गए।उनकी यह सब माया धरी की धरी रह गई।

      

जिन्होंने अच्छे कार्य से जनता को दिल में बैठाया,

  उनकी कीर्ति आज भी है, वह वर्षो तक रहेगी।


 *ज्योतिष शास्त्र यही कहता है-*

         *************

 बुध= बुद्धिमान,लेखक,कवि व शास्त्रज्ञ।


 गुरु=ज्ञानी, धनवान।


सूर्य=सत्ताधिकारी, कीर्तिवान।


 इनसे  भी एक और बड़ा है निर्णायक 

          *************

*वह है शनि- समय,और काल... आप अपने हाथ को ही देखिये, बुध,*

  *सूर्य,व गुरु की अँगुलियों में से शनि की अंगुली सबसे बड़ी है।* 


    शनि ही गुप्त भाग्य, कर्म, मृत्यु है, *काल ...है,और समय.. है*


          *शनि सब कुछ देता है*, 

     *और पुनः अपने में ही समेट* *लेता है।*


 || *जय शनिदेव प्रणाम आपको* ||

                ✍

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Monday, 10 July 2023

सावन माह के सोमवार के व्रत

 *हर हर महादेव जी* 


|| *सावन मास का प्रथम सोमवार* ||


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4 जुलाई दिन मंगलवार से सावन मास की शुरुआत हो चुकी है और  आज 10 जुलाई को सावन मास के पहले सोमवार का व्रत  है। सावन का महीना भगवान शिव का प्रिय मास है और इस बार मलमास या पुरुषोत्तम मास की वजह से चार नहीं बल्कि आठ सोमवार के व्रत किये जाएंगे। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, पूरे वर्ष शिव पूजा का जो पुण्य मिलता है, वह सावन सोमवार में भगवान शिव का जलाभिषेक और बेलपत्र अर्पित करने से प्राप्त हो जाता है। सोने पर सुहागा यह है कि इस बार सावन के पहले सोमवार पर कई सुंदर योग बन रहे हैं, जिससे इसका महत्व कई गुणा बढ़ गया है।साथ ही गुरु और चंद्रमा के एक राशि में होने पर गजकेसरी नामक शुभ योग भी बन रहा है, जिससे सावन के पहले सोमवार का महत्व बढ़ गया है। 


इसके साथ ही पुरुषोत्तम मास के स्वामी श्रीहरि हैं,जिससे सावन में हरि और हर दोनों की कृपा प्राप्त करने का शुभ संयोग बन रहा है।


सावन सोमवार का महत्व-

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मान्यताओं के अनुसार, सावन सोमवार का व्रत करने से भाग्य बदल जाता है और शिव की कृपा हमेशा बनी रहती है।  गृहस्थ जीवन के लिए मनोवांछित जीवन साथी की प्राप्ति ओर वैवाहिक जीवन में खुशहाली और जीवन में हर तरह की सुख समृद्धि के लिए सावन के सोमवार का व्रत किया जाता है। इस मास की गई पूजा से भगवान शिव जल्द प्रसन्न होते हैं और ग्रह-नक्षत्रों के स्वामी होने की वजह से सभी दोष भी दूर होते हैं ओर कई तरह की सिद्धियों भी सिद्ध हो जाती हैं इसके अलावा मान्यता है कि भगवानशिव सावन मास में धरती पर अपने ससुराल गए थे, जहां उनका भव्य स्वागत जलाभिषेक और अर्घ्य देकर किया गया था। इसलिए इस मास भक्त भक्ति में लीन रहते हैं, जिससे शिव कृपा प्राप्त की जा सके।


       *जय शिव शंकर महादेव* 

*             *हर हर महादेव*

                   ✍☘💕

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Sunday, 9 July 2023

ध्यान से पढ़ें और समझें

 *राम राम जी*


*पढ़ें और समझें*



दुर्योधन ने उस अबला स्त्री को देख कर अपनी जंघा ठोकी थी, तो उसकी जंघा तोड़ी गयी। दु:शासन ने छाती ठोकी तो उसकी छाती फाड़ दी गयी।


महारथी कर्ण ने एक असहाय स्त्री के अपमान का समर्थन किया, तो श्रीकृष्ण ने असहाय दशा में ही उसका वध कराया।


     भीष्म ने यदि प्रतिज्ञा में बंध कर एक स्त्री के अपमान को देखने और सहन करने का पाप किया, तो असँख्य तीरों में बिंध कर अपने पूरे कुल को एक-एक कर मरते हुए भी देखा...।

 

भारत का कोई बुजुर्ग अपने सामने अपने बच्चों को मरते देखना नहीं चाहता, पर भीष्म अपने सामने चार पीढ़ियों को मरते देखते रहे। जब-तक सब देख नहीं लिया, तब-तक मर भी न सके... यही उनका दण्ड था।

  


     धृतराष्ट्र का दोष था पुत्रमोह, तो सौ पुत्रों के शव को कंधा देने का दण्ड मिला उन्हें। सौ हाथियों के बराबर बल वाला धृतराष्ट्र सिवाय रोने के और कुछ नहीं कर सका।


     दण्ड केवल कौरव दल को ही नहीं मिला था। दण्ड पांडवों को भी मिला।


 द्रौपदी ने वरमाला अर्जुन के गले में डाली थी, सो उनकी रक्षा का दायित्व सबसे अधिक अर्जुन पर था। अर्जुन यदि चुपचाप उनका अपमान देखते रहे, तो सबसे कठोर दण्ड भी उन्ही को मिला। अर्जुन पितामह भीष्म को सबसे अधिक प्रेम करते थे, तो कृष्ण ने उन्ही के हाथों पितामह को निर्मम मृत्यु दिलाई।

 


अर्जुन रोते रहे, पर तीर चलाते रहे... क्या लगता है, अपने ही हाथों अपने अभिभावकों, भाइयों की हत्या करने की ग्लानि से अर्जुन कभी मुक्त हुए होंगे क्या ? नहीं... वे जीवन भर तड़पे होंगे। यही उनका दण्ड था।


    युधिष्ठिर ने स्त्री को दाव पर लगाया, तो उन्हें भी दण्ड मिला। कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी सत्य और धर्म का साथ नहीं छोड़ने वाले युधिष्ठिर ने युद्धभूमि में झूठ बोला, और उसी झूठ के कारण उनके गुरु की हत्या हुई। यह एक झूठ उनके सारे सत्यों पर भारी रहा... धर्मराज के लिए इससे बड़ा दण्ड क्या होगा ?


     दुर्योधन को गदायुद्ध सिखाया था स्वयं बलराम ने। एक अधर्मी को गदायुद्ध की शिक्षा देने का दण्ड बलराम को भी मिला। उनके सामने उनके प्रिय दुर्योधन का वध हुआ और वे चाह कर भी कुछ न कर सके...


     उस युग में दो योद्धा ऐसे थे जो अकेले सबको दण्ड दे सकते थे, कृष्ण और बर्बरीक। पर कृष्ण ने ऐसे कुकर्मियों के विरुद्ध शस्त्र उठाने तक से इनकार कर दिया, और बर्बरीक को युद्ध में उतरने से ही रोक दिया।

 


लोग पूछते हैं कि बर्बरीक का वध क्यों हुआ? 

यदि बर्बरीक का वध नहीं हुआ होता तो द्रौपदी के अपराधियों को यथोचित दण्ड नहीं मिल पाता। कृष्ण युद्धभूमि में विजय और पराजय तय करने के लिए नहीं उतरे थे, कृष्ण कृष्णा के अपराधियों को दण्ड दिलाने उतरे थे।


     कुछ लोगों ने कर्ण का बड़ा महिमामण्डन किया है। पर सुनिए! कर्ण कितना भी बड़ा योद्धा क्यों न रहा हो, कितना भी बड़ा दानी क्यों न रहा हो, एक स्त्री के वस्त्र-हरण में सहयोग का पाप इतना बड़ा है कि उसके समक्ष सारे पुण्य छोटे पड़ जाएंगे। द्रौपदी के अपमान में किये गये सहयोग ने यह सिद्ध कर दिया कि वह महानीच व्यक्ति था, और उसका वध ही धर्म था।


     "स्त्री कोई वस्तु नहीं कि उसे दांव पर लगाया जाय..."। 


कृष्ण के युग में दो स्त्रियों को बाल से पकड़ कर घसीटा गया। 


देवकी के बाल पकड़े कंस ने, और द्रौपदी के बाल पकड़े दु:शासन ने। श्रीकृष्ण ने स्वयं दोनों के अपराधियों का समूल नाश किया। किसी स्त्री के अपमान का दण्ड  अपराधी के समूल नाश से ही पूरा होता है, भले वह अपराधी विश्व का सबसे शक्तिशाली व्यक्ति ही क्यों न हो...।


यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भव- ति भारत ।

अभ्युत्थान- मधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्- ॥ 

परित्राणाय- साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्- । 

धर्मसंस्था-पनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥


🙏🙏


*राम राम जी*


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Monday, 3 July 2023

गुरु पूर्णिमा पर आप सभी को...

 *गुरु पूर्णिमा पर....*

                   🙏🙏

 *गुरु ह्रदय में , सदा  गुरु  ही है  भ्रम  का  काल*

*गुरु  अवगुण  को  मेटते,  मिटे  सभी  भ्रमजाल*


*मेरे सुख-दुख में, अच्छे- बुरे वक्त में , व्यवसाय के क्षेत्र में या सामाजिक व धार्मिक कार्य में, कोई मित्र के रूप में , कोई मार्गदर्शक के रूप में तो कोई शुभचिंतक के रूप में  आप लोगों ने मुझे समय समय पर मार्गदर्शन देकर मेरे मनोबल को बढ़ाया है, मुझे सही रास्ता दिखाया है*, 

*आप जैसे सभी आदरणीय स्नेही मित्र शुभचिंतकों  व पूज्यनीय गुरुओं को नतमस्तक होकर प्रणाम करता हूँ और गुरुपूर्णिमा की बधाई देता हूँ....*

               🙏🙏




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गुरु पूर्णिमा....

 *गुरु पूर्णिमा*


*गुरु ब्रह्मा, गुरु विष्णु, गुरु देवो महेश्वरा:*

  *गुरु साक्षात परम ब्रह्मा, तस्मै श्री गुरुवे नम:।*


            🙏🙏



*हरि रूठे गुरु ठौर है, गुरु रूठे नहिं ठौर*'


      ******************

*यानी भगवान के रूठने पर गुरु की शरण मिल जाती है, लेकिन गुरु अगर रूठ जाए तो कहीं भी शरण नहीं मिलती। गुरु की जरूरत हमें अपने जीवन चक्र में पग पग पर पड़ती हैं वो जरूरत चाहे किसी भी रुप में हो। गुरु हमें किसी भी रुप में, किसी भी रिश्ते में मिल सकता है  इसलिए जीवन में गुरु का विशेष महत्व  है। मान्यता है कि आप जिसे भी अपना सच्चे मन से दिल से गुरु मानते हों, गुरु पूर्णिमा के दिन आपको उसकी पूजा करनी चाहिए आशीर्वाद लेना चाहिए गुरू की पूजा करने से ब आशीर्वाद लेने से जीवन की बहुत सारी बाधाएं दूर हो जाती है।*


      *|| *गुरु पूर्णिमा की हार्दिक बधाई ||*

                    ✍☘💕


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गुरु पूर्णिमा

 गुरु ब्रह्मा; गुरु विष्णु ,गुरु देवो महेश्वरा ,गुरु साक्षात परब्रह्मा तस्मै श्री गुरुवे नमः 






गुरु पूर्णिमा की आपको  हार्दिक शुभकामनाएं 


Friday, 30 June 2023

श्रावण मास और मंत्र उपाय

 *सावन मास और  ब्रत, मंत्र,उपाय*


शिव जी का प्रिय श्रावणमास 4 जुलाई मंगलवार से प्रारंभ होकर 31 अगस्त गुरुवार को समाप्त हो रहा है। इस बार दो श्रावण मास (एक अधिमास) एवं 8 सोमवार से युक्त पुण्य पवित्र श्रावण मास शुभ फलदाई है।  श्रावण मास का प्रथम  पक्ष 4 जुलाई से 17 जुलाई तक शुद्ध श्रावण कृष्ण पक्ष तथा 18 जुलाई से अधिमास श्रावण शुक्ल पक्ष एवं अधिमास श्रावण कृष्ण पक्ष 16 अगस्त तक रहेगा इसे पुरूषोत्तम मास, (मलमास )भी कहते हैं विशिष्ट योगों का यह मास आप के लिए है कुछ खास कल्याणकारी हैं। अधिमास का पहला सोमवार 24 

जुलाई को शिव योग में होगा जिन जातकों की कुंडली में चंद्र दोष है उन्हें इस दिन की पूजा से विशेष लाभ मिलेगा।

इस श्रावणमास (पुरूषोत्तम मास)में दोनों पक्षों में क्रमशः 

24, 31जुलाई,7 व 14 अगस्त इन चारों सोमवार व्रत को

प्रदोष व्रत  की भांति को रखा जायेगा। इसी अवधि में

पुरूषोत्तमी एकादशी का व्रत 12अगस्त द्विपुष्कर योग में

मनाया जाएगा। ''प्रदोष'' भगवान शिव की सबसे प्रिय तिथि है। यह श्रावण मास में  और अधिक पुण्यप्रद होती है।पूजा की पुण्य प्राप्ति में कई गुना वृद्धि हो जाती है। पुरूषोत्तम मास के चार सोमवार तथा शुद्ध श्रावण मास के चार सोमवार हैं आठ सोमवार का व्रत आपकी श्रद्धा सामर्थ्य और स्वास्थ्य पर निर्भर करता है। अन्यथा की स्थिति में पुरुषोत्तम मास के सोमवार व्रत। रहें।                                                                         इस श्रावणमास में  कर्क और वृश्चिक राशि पर शनि की

ढैया तथा कुंभ और मीन राशियों पर शनि की साढ़ेसाती का प्रभाव रहेगा । ऐसे जातकों को प्रतिदिन सावन माह में शिव चालीसा का पाठ करना चाहिए।

महिलाओं के लिए मंगलागौरी व्रत का विधान श्रावण मास के प्रत्येक मंगलवार को किये जाने का विधान है,(यह मंगलवार को ही यह व्रत करें) सुख-सौभाग्य, गृह कलह, सन्तान सुख,निरोगता के साथ साथ, जाने अनजाने लगने वाले मांगलिक दोष को भी समाप्त करने वाला है।                                      

पूजा मंत्र :-सर्वमंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके।                   शरण्ये त्र्यंबके गौरी नारायणी नमोस्तुते।।

कुंवारी लड़कियां जिनके विवाह में बाधा आ रही है । इस व्रत को अवश्य करना चाहिए। उनके लिए बीज मंत्र इस प्रकार है

" ह्रीं मंगले गौरि विवाह बाधां नाशाय स्वाहा ।"

सूर्योदय से पहले उठकर स्नानादि से निवृत्त होकर मां पार्वती जी की मूर्ति/चित्र (अकेला न मिले तो शिव सपरिवार सहित) लाल कपड़े पर स्थापित करें। तत्पश्चात षोडस विधि (सोलह पूजा सामग्री श्रंगार के सामान सहित) से पूजा करें। इस व्रत में एक बार अन्न ग्रहण का प्रावधान है। यह माह सभी जातकों के लिए पुण्य फलदायक है, किन्तु कालसर्प दोष ,शनि ग्रह जनित पीड़ा, शनि की महादशा, शनि की साढ़ेसाती, जन्म कुंडली में शनि की खराब स्थिति की पीड़ा निवारणार्थ व्रत पूजन के लिए  यह माह अत्यन्त महत्वपूर्ण है। इस दिन शिव जी के अभिषेक से (रूद्राभिषेक)  कुंडलीमें स्थित पितृदोष की भी शांति होती है।       

अपनी जन्मकुंडली को किसी अच्छे ज्योतिष विद्वान से अवलोकन करवाकर कुंडली में ग्रह राशि नक्षत्रों से बनने वाले योग/दोष जानकर उनके उपाय परहेज़ अवश्य करें

*राम राम जी*      


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Sunday, 25 June 2023

ऊर्जावान स्थान ब काला रंग...

 *राम राम जी*


ऊर्जावान से भरपुर स्थान पर

  काले रंग का प्रभाव और महत्व

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रंगों का मनुष्य के जीवन पर व्यापक असर पड़ता है। हर रंग का व्यक्ति पर अलग-अलग प्रभाव होता है। रंग हमारे जीवन में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं। हर रंग अपने साथ कुछ अलग विचार और एनर्जी लाते हैं।कभी-  कभी हमें परिवार के लोग शुभ दिनों पर या सामान्य तौर पर भी काले कपड़े पहनने से मना करते हैं। क्या सच में काले रंग का बुरा असर हो सकता है?


काला रंग पसंद करने वाले लोग मन से शांत नहीं होते, लेकिन वे अपने आसपास की एनर्जी को अपने अंदर समाहित कर लेते है। फिर चाहे वह एनर्जी अच्छी हो या बुरी. काला रंग शक्ति, औपचारिकता, बुराई, मृत्यु, शोक, नीरसता, भारीपन, अवसाद और विद्रोह जैसे भाव पैदा करता है. यह रंग असंतुलन पैदा करता है. शांति का विनाश भी करता है।


कोई चीज काली है या आपको काली प्रतीत होती है, इसकी वजह यह है कि यह कुछ भी परावर्तित नहीं करती, कुछ भी लौटाती नहीं,सब कुछ सोख लेती है। तो अगर आप किसी ऐसी जगह हैं, जहां एक विशेष कंपन और शुभ ऊर्जा है तो आपके पहनने के लिए सबसे अच्छा रंग काला है क्योंकि ऐसी जगह से आप शुभ ऊर्जा ज्यादा से ज्यादा अवशोषित करना चाहेंगे, आत्म सात करना चाहेंगे। जब आप दुनिया से घिरे होते हैं,लाखो करोड़ों अलग-अलग तरह की चीजों के संपर्क में होते हैं, तो सफेद कपड़े पहनना सबसे अच्छा है, क्योंकि आप कुछ भी ग्रहण करना नहीं चाहते, आप सब कुछ वापस कर देना, परावर्तित कर देना चाहते हैं।


काले कपड़े उर्जा संकलन का सर्वश्रेष्ठ रंग है-

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लेकिन अगर आप किसी ऐसी स्थिति में काला रंग पहनते हैं, जो शुभ ऊर्जा से भरपूर है तो आप इस ऊर्जा को अधिक से अधिक ग्रहण कर सकते हैं, जो आपके लिए अच्छा है।


इसलिए शनि देव को पसंद है काला कपड़ा–

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ज्‍योतिषशास्‍त्र में शनि देव को श्‍यामवर्ण बताया गया है।इसलिए अशुभ शनि के प्रभाव को कम करने के लिए काली चीज़ों का दान किया जाता है क्‍योंकि शनि देव का काला रंग पसंद है। काली चीज़ों का दान करने से शनि का दोष कम हो जाता है।


भगवान शिव एवं शनिदेव को हमेशा काला माना जाता है क्योंकि किसी भी चीज को ग्रहण करने में उन्हें कोई समस्या नहीं है। यहां तक कि जब उन्हें विष दिया गया तो उसे भी उन्होंने सहजता से पी लिया। उनमें खुद को बचाए रखने की भावना नहीं है, क्योंकि उनके साथ ऐसा कुछ होता भी नहीं है। इसलिए वह हर चीज को ग्रहण कर लेते हैं, किसी भी चीज का विरोध नहीं करते काला कपड़ा उर्जा संकलन करने का सर्वक्षेष्ठ रंग है।


     *राम राम जी*

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Thursday, 8 June 2023

क्रोध पाप का मूल... हमारा शत्रु

 *राम राम जी*


|| *क्रोध हमारा आंतरिक शत्रु है* ||

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    अनेक मतो का संकलन 

         

क्रोध प्राणहरः शत्रुः क्रोधऽमित्रमुखो रिपुः । 

   क्रोधोऽसि महातीक्षणः सर्व क्रोधोऽर्षति ॥ 


 त्पते यतते चैव यच्च दानं प्रयच्छति ।

   क्रोधेन सर्व हरति तस्मात क्रोधं विवजयेत् ॥ 

          (बाल्मीकि रामायण उत्तर-71)


अर्थात् क्रोध प्राण हरण करने वाला शत्रु, क्रोध अमित्र -मुखधारी बैरी है,क्रोध महा तीक्ष्ण तलवार है, क्रोध सब प्रकार से गिराने वाला है, क्रोध तप, संयम,और दान सभी हरण कर लेता है। अत एव, क्रोध को छोड़ देना चाहिए।


वाह्य शत्रुओं से सावधान रहकर बचा जा सकता है, 👉लेकिन इनसे अधिक भयंकर आंतरिक शत्रु काम, क्रोध, लोभ, मोह होते हैं। इनसे बचना काफी मुश्किल होता है। आंतरिक शत्रुओं में से कोई एक आक्रमण कर दे तो जीव पराजित हो जाता है।महाराज दशरथ जब सभा से उठे तो उन पर👉 शत्रु काम ने आक्रमण कर दिया और वह कैकेयी के भवन की तरफ चल दिए थे।


 प्राचीन समय में बड़े-बड़े राजा -महाराजा ओं के बीच युद्ध का कारण भी क्रोध ही होता था,आज घरों में विवाद का कारण भी क्रोध ही है। अगर आपने क्रोध को शांत कर लिया, तो सारे विवाद अपने आप ही समाप्त हो जाएंगे।


 क्रोध हमारा आन्तरिक शत्रु है -

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क्रोध एक प्रकार का भूत है, जिसके संचार होते ही मनुष्य आपे में नहीं रहता। उस पर किसी दूसरी सत्ता का प्रभाव हो जाता है। मन की निष्ठ वृत्तियाँ उस पर अपनी राक्षसी माया चढ़ा देती हैं, वह बेचारी इतनी हतप्रत बुद्धि हो जाता है कि उसे यह ज्ञान ही नहीं रहता कि वह क्या कर रहा है।


आधुनिक मनुष्य का आन्तरिक जीवन और मानसिक अवस्था अत्यन्त विक्षुब्ध है, दूसरों में वह अनिष्ट देखता है, उनसे हानि होने की कुकल्पना में डूबा रहता है, जीवन पर्यन्त इधर उधर लुढ़कता, ठुकराया जाता रहता है, शोक दुःख, चिंता, अविश्वास, उद्वेग, व्याकुलता आदि विकारों के वशीभूत होता रहता है। ये क्रोध जन्य मनोविकार अपना विष फैलाकर मनुष्य का जीवन विषैला बना रहे हैं। उसकी👉 आध्यात्मिक शक्तियों का शोषण कर रहे हैं। साधना का सबसे बड़ा विघ्न क्रोध नाम का महाराक्षस ही है।


क्रोध शान्ति भंग करने वाला मनोविकार है। एक बार क्रोध आते ही मन को अवस्था विचलित हो उठती है, श्वासोच्छवास तीव्र हो उठता है, हृदय विक्षुब्ध हो उठता है। यह अवस्था आत्मिक विकास के विपरीत है। आत्मिक उन्नति के लिए शान्ति, प्रसन्नता, प्रेम और सद्भाव चाहिए।

जो व्यक्ति क्रोध के वश में है, वह एक ऐसे दैत्य के वश में है, जो न जाने कब मनुष्य को पतन के मार्ग में धकेल दे। क्रोध तथा आवेश के विचार आत्म बल का ह्रास करते हैं।


        || क्रोध पाप का मूल  ||

                ✍☘

*राम राम जी*

🙏🙏

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Saturday, 3 June 2023

धर्म स्थल की पैड़ी या आटले पर क्यों बैठना...

 *राम राम जी*


*"मंदिर धर्म स्थल की पैड़ी या आटले पर क्यों बैठना चाहिए...?"*


बड़े बुजुर्ग कहते हैं कि जब भी किसी मंदिर में दर्शन के लिए जाएं तो दर्शन करने के बाद बाहर आकर मंदिर की पेडी या ऑटले पर थोड़ी देर बैठते हैं, क्या आप जानते हैं इस परंपरा का क्या कारण है?


आजकल तो लोग मंदिर की पैड़ी पर बैठकर अपने घर की व्यापार की राजनीति की चर्चा करते हैं परंतु यह प्राचीन परंपरा एक विशेष उद्देश्य के लिए बनाई गई।


वास्तव में मंदिर की पैड़ी पर बैठ कर के हमें एक श्लोक का स्मरण करनी चाहिये और अपनी आने वाली पीढ़ी को भी बताना चाहिये....


अनायासेन मरणम् ,बिना देन्येन जीवनम्।

देहान्त तव सानिध्यम्, देहि मे परमेश्वरम् ।।


इस श्लोक का अर्थ है-


अनायासेन मरणम्... 

अर्थात बिना तकलीफ के हमारी मृत्यु हो और हम कभी भी बीमार होकर बिस्तर पर पड़े पड़े, कष्ट उठाकर मृत्यु को प्राप्त ना हो चलते फिरते ही हमारे प्राण निकल जाएं !!


बिना देन्येन जीवनम्... 

अर्थात परवशता का जीवन ना हो मतलब हमें कभी किसी के सहारे ना पड़े रहना पड़े, जैसे कि लकवा हो जाने पर व्यक्ति दूसरे पर आश्रित हो जाता है वैसे परवश या बेबस ना हो, ठाकुर जी की कृपा से बिना भीख के ही जीवन बसर हो सके !!


देहांते तव सानिध्यम.. 

अर्थात जब भी मृत्यु हो तब भगवान के सम्मुख हो, जैसे भीष्म पितामह की मृत्यु के समय स्वयं ठाकुर जी उनके सम्मुख जाकर खड़े हो गए, उनके दर्शन करते हुए प्राण निकले !!


देहि में परमेशवरम्...

हे परमेश्वर ऐसा वरदान हमें देना !!

यह प्रार्थना करें।


गाड़ी, लाडी, लड़का, लड़की, पति, पत्नी, घर, धन यह नहीं मांगना है यह तो भगवान आप की पात्रता के हिसाब से खुद आपको देते हैं, इसीलिए दर्शन करने के बाद बैठकर यह प्रार्थना अवश्य करनी चाहिए।


यह प्रार्थना है, याचना नहीं।


याचना सांसारिक पदार्थों के लिए होती है जैसे कि घर, व्यापार, नौकरी, पुत्र, पुत्री, सांसारिक सुख, धन या अन्य बातों के लिए जो मांग की जाती है वह याचना है वह भीख है।


हम प्रार्थना करते हैं प्रार्थना का विशेष अर्थ होता है अर्थात विशिष्ट, श्रेष्ठ, अर्थना अर्थात निवेदन, ठाकुर जी से प्रार्थना करें और प्रार्थना क्या करना है, यह श्लोक बोलना है।


सब से जरूरी बात... जब हम मंदिर में दर्शन करने जाते हैं तो खुली आंखों से भगवान को देखना चाहिए, निहारना चाहिए, उनके दर्शन करना चाहिए। कुछ लोग वहां आंखें बंद करके खड़े रहते हैं, आंखें बंद क्यों करना हम तो दर्शन करने आए हैं, भगवान के स्वरूप का, श्री चरणों का ,मुखारविंद का, श्रंगार का, संपूर्णानंद लें। आंखों में भर ले स्वरूप को, दर्शन करें और दर्शन के बाद जब बाहर आकर बैठे तब नेत्र बंद करके जो दर्शन किए हैं उस स्वरूप का ध्यान करें, मंदिर में नेत्र नहीं बंद करना, बाहर आने के बाद पैड़ी पर बैठकर जब ठाकुर जी का ध्यान करें तब नेत्र बंद करें और अगर ठाकुर जी का स्वरूप ध्यान में नहीं आए तो दोबारा मंदिर में जाएं और भगवान का दर्शन करें, नेत्रों को बंद करने के पश्चात उपरोक्त श्लोक का पाठ करें, यहीं शास्त्र हैं यहीं बड़े बुजुर्गो का कहना हैं ...


*राम राम जी*


*Research Astrologers Pawan Kumar Verma (B.A.,D.P.I.,LL.B.) & Monita Verma Astro Vastu... Verma's Scientific Astrology and Vastu Research Center Ludhiana Punjab Bharat Phone...9417311379. www.astropawankv.com*



Wednesday, 31 May 2023

निर्जला एकादशी..

 *राम राम जी*


निर्जला एकादशी आज

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हिंदू धर्म में एकादशी का विशेष महत्व होता है। सालभर में कुल 24 एकादशी आती हैं। इन एकादशी में से ही एक है निर्जला एकादशी। मान्यतानुसार निर्जला एकादशी को सबसे कठिन एकादशी कहा जाता है। निर्जला एकादशी के व्रत में भक्त पानी तक नहीं पीते हैं जिस चलते इसका नाम निर्जला एकादशी पड़ा है। निर्जला एकादशी के दिन भगवान विष्णु की पूजा के साथ ही दान-पुण्य करना शुभ मानते हैं। माना जाता है कि जो भक्त निर्जला एकादशी का व्रत रखते हैं उन्हें तीर्थों में स्नान करने जितना फल प्राप्त होता है।


निर्जला एकादशी व्रत को पाप मुक्ति के लिए रखा जाता है। माना जाता है कि इस व्रत को रखने से भक्तों के जीवन के कष्ट हट जाते हैं और सुख प्राप्ति होती है। पंचांग के अनुसार ज्येष्ठ माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि पर निर्जला एकादशी का व्रत रखा जाएगा। 


एकादशी तिथि

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30 मई के दिन एकादशी तिथि की शुरूआत दोपहर 1  बजकर 7 मिनट से हो रही है और इसका समापन अगले दिन 31 मई, बुधवार दोपहर 1 बजकर 45 मिनट पर होगी। इस चलते निर्जला एकादशी 31 मई, बुधवार के दिन मनाई जाएगी और निर्जला एकादशी का व्रत बुधवार के दिन ही रखा जाएगा।


निर्जला एकादशी व्रत का पारण 1 जून, गुरुवार के दिन होगा। व्रत पारण का शुभ मुहुर्त सुबह 5 बजकर 24 मिनट से सुबह 8 बजकर 10 मिनट के बीच माना जा रहा है।


निर्जला एकादशी की पूजा विधि

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निर्जला एकादशी के दिन सुबह उठकर स्नान किया जाता है। इस दिन ब्रह्म मुहूर्त में स्नान करना बेहद शुभ होता है। इस दिन भगवान विष्णु को प्रसन्न करने के लिए भक्त उनके प्रिय पीले रंग के वस्त्र पहनते हैं। इसके पश्चात धूप, दीप आदि के साथ पूजा की जाती है और श्री हरि से अपनी मनोकामनाएं कहने के साथ ही अपनी गलितयों की क्षमा मांगी जाती है। शाम के समय एकबार फिर विष्णु पूजा होती है। इस विष्णु पूजा में भक्त भगवान विष्णु की आरती गाते हैं, भजन करते हैं, भोग लगाते हैं और प्रसाद का वितरण करते हैं। भक्त अगली सुबह स्नान पश्चात ही निर्जला व्रत का पारण कर व्रत समाप्ति करते हैं।


निर्जला एकादशी के दिन जरूर करें ये उपाय

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पीले वस्त्र करें अर्पित

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निर्जला एकादशी के दिन जगत के पालनहार भगवान श्री हरि विष्णु को पीले रंग के वस्त्र अर्पित करें। मान्यता है कि ऐसा करने से सभी परेशानियां दूर हो सकती है।


जरूरतमंदों को करें दान

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निर्जला एकादशी व्रत के दिन दान का काफी महत्व होता है। इस दिन पीले वस्त्र, तिल, फल आदि चीजें किसी जरूरतमंद को जरूर दान करनी चाहिए। इससे पुण्य की प्राप्ति होती हैं।


केले का पौधा लगाएं

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निर्जला एकादशी के दिन घर में केले का पौधा लगाएं। ऐसा करना शुभ माना जाता है। वहीं हर गुरुवार को इस पौधे में हल्दी मिला हुआ जल अर्पित करें। ऐसा करने से भगवान विष्णु जल्द प्रसन्न हो जाते है और हर परेशानी से छुटकारा मिल जाता है।


पीपल को जल चढ़ाएं

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मान्यता है कि पीपल के पेड़ में भगवान विष्णु का वास होता है। इसलिए निर्जला एकादशी के दिन यदि आप किसी तरह का उपाय नहीं कर सकते हैं, तो पीपल के पेड़ में जल जरूर अर्पित करें।


*राम राम जी*

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Saturday, 22 April 2023

अक्षय तृतीया

 *राम राम जी*

*अक्षय तृतीया*


*जिस प्रकार"श्वास" आपके"शरीर"को चलाता है,,*

*उसी प्रकार,,*

   *"विश्वास"आप के"सम्बंन्धो"को चलता है !* 

*लेकिन..*

*"श्वास आपके हाथों में नहीं है,,,*

*अपितु"विश्वास"आप ही के हाथों में है ,,*

*अतः उसे बनाकर रखिये,,!!*

    

     *ॐश्री मंहालक्ष्मीःदैवैय्यै नंमः!!*



*अक्षय रहे *सुख* *आपका,* 

 *अक्षय रहे *धन* *आपका,* 

 **अक्षय रहे *प्रेम *आपका,* 

 *अक्षय रहे *स्वास्थ्य आपका,* 

 *अच्छे रहे* *रिश्ता* *हमारा,* 


*अक्षय तृतीया का इतना महत्व क्यों है*

   जानिए कुछ और महत्वपुर्ण जानकारी 

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माँ गंगा का अवतरण धरती

     पर आज ही के दिन हुआ था।


महर्षी श्री परशुराम जी का जन्म

      आज ही के दिन हुआ था।


माता अन्नपूर्णा का जन्म भी 

      आज ही के दिन हुआ था।


द्रोपदी को चीरहरण आज ही 

   दिन भगवान कृष्ण ने बचाया था।


भगवान कृष्ण और मित्र सुदामा का

     मिलन आज ही के दिन हुआ था।


भगवन कुबेर को आज ही के

        दिन खजाना मिला था।


सतयुग और त्रेता युग का प्रारम्भ 

       आज ही के दिन हुआ था।


प्रसिद्ध तीर्थ स्थल श्री बद्री नारायण जी व बद्री विशाल

    जी का कपाट आज ही के दिन खोला जाता है।


 बृंदावन के भगवान श्री बाँके बिहारी जी

   मंदिर में साल में केवल आज ही के 


दिन श्री चरण विग्रह के दर्शन होते है 

    अन्यथा साल भर वह वस्त्र से ढके रहते है। 


आज ही के दिन महाभारत

      का युद्ध समाप्त हुआ था।


अक्षय तृतीया के दिन कोई भी शुभ 

  कार्य का प्रारम्भ किया जा सकता है। 

    अक्षय तृतीया अपने आप में स्वयं सिद्ध मुहूर्त है।



💐 *अक्षय तृतीया की आपको* *और आपके संपूर्ण *परिवार  को* 

*💐हार्दिक शुभकामनाएं*💐

              🙏🙏

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